निगमानंद से दो साल बड़े भाई और बंगलुरु में साफ्टवेयर इंजीनियर सत्यम कुमार आशीष ने बताया निगमानंद बेहद शांत स्वभाव के थे। शुरु से ही वह पढ़ने में तेज रहे। इंजीनियर बनना निगमानंद का सपना था। बिहार से हाई स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद पिता प्रकाश चंद्र था जो कि झारखंड में लघु सिंचाई में इंजीनियर हैं, ने निगमानंद को दिल्ली पढ़ाई के लिए भेज दिया। वहां निगमानंद ने ग्रीन फील्ड स्कूल में ग्यारहवीं की पढ़ाई के दौरान ही आईआईटी एंट्रेस एग्जाम की तैयारी भी शुरू कर दी थी। उन्होंने बताया कि परिवार में निगमानंद उर्फ स्वरूपम कुमार आशीष सबसे छोटे होने के कारण सभी के लाडले थे। 19 साल माता-पिता के साथ घर में बिताने पर कभी उन्होंने धर्म और अध्यात्म ग्रहण करने की बात नहीं की। हमेशा पढ़ाई और परिवार के बारे में भी बात किया करते थे। धर्म और अध्यात्म के प्रति उनका ज्ञान महज एक आम भारतीय जितना ही था। बिहार से दिल्ली आने के बाद भी उन्होंने कभी किसी आंदोलन से जुड़ने या अध्यात्म की शरण में जाने की बात नहीं की। 1995 में पढ़ाई के दौरान ही वह लापता हो गए। तीन सालों तक लगातार तलाशने पर 1998 में स्वामी निगमानंद हरिद्वार में मिले। उनके भाई ने बताया कि तब मातृ सदन के स्वामी शिवानंद से पूछा गया था, लेकिन उन्होंने निगमानंद के आश्रम में न होने की बात कही थी।
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